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Wednesday, 23 September 2015

तोहफा

ज़रा एक लफ़्ज़ों का गुच्छा देना था तुम्हे
इक असल नसल का, चमकीला सा
अनछुआ और सौंधा सौंधा
ढँका हुआ सा कोरा कोरा लफ्ज़

नये मोतियों सा उजला सा कुछ
गीला गीला लफ्ज़
एक अनूठा सा तोहफा होता
जो होता सिर्फ़ तुम्हारा

कुछ शहद सा, गाढ़ा गाढ़ा
नारंगी लौ में लिपटा कोई लफ्ज़
जो तुम्हे छू कर पानी सा काँप जाता
कोई लफ्ज़ जो तुम्हारी सिलवटों में महकता
बालों की उलझन सा सुलझा हुआ लफ्ज़
तराशना होगा एक नया सा लफ्ज़

पर हर लफ्ज़ जो ज़हन में है
वो उधार का है, मेरा अपना नही
किसी और ने पहले ही गढ़ लिया था अपनी प्रेमिका के लिए
वो मैला और कुचैला सा, घिसा हुआ सा लफ्ज़
अब तो तराशना होगा एक नया सा लफ्ज़

इक असल नसल का, चमकीला सा
अनछुआ और सौंधा सौंधा
ज़रा एक लफ़्ज़ों का गुच्छा देना था तुम्हे