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Thursday, 19 May 2016

२० मई, पुराना बरगद और मैं

हैप्पी बिर्थडे, डैडी


इस साल मैं कोई तोहफा तो नहीं दे रही पर कुछ दिए बिना मन मान भी नहीं रहा है। कभी सोचती हूँ कि ऐसा भी क्या दे पाउंगी जो 'आपको' दे पाऊं। तोहफों के मामले में आपके सामने खुद को हमेशा सुदामा सा पाती हूँ। अंडर-कॉन्फिडेंट और संकुचाइ हुई सी।

पर ये एहसास जितनी जल्दी आता है, उतनी ही जल्दी छू भी हो जाता है। डिज़ास्टर मैनेजमेंट की तरह। और हो भी क्यों न, आपने ही तो हमेशा कहा है कि खुद पे विश्वास कर के आगे बढ़ते रहना चाहिए।

आपने हर दिन मुझे कुछ न कुछ सिखाया है। Eucalyptus की स्पेलिंग याद रखने की फोनेटिक ट्रिक से ले कर ज़बान में अदब रखने के गुर तक... कितना कुछ सीखा है आपसे मैंने। और कितना कुछ फिर भी रह ही जाएगा। आपके साथ एक दिन बढ़ता है तो अगली ही सुबह कम भी हो जाता है। गिव एंड टेक ऑफ़ लाइफ।


वैसे क्या आपने कभी ज़रा ठिठक कर ये सोचा है की हर साल हमारे कैलेन्डर में कितने ही सारे खास दिन आते हैं? १५ अगस्त, विमेंस डे से ले कर हल-षष्ठी और वैलेंटाइन्स डे तक। कुछ दिन, जैसे कि दीवाली, चटकीले वाले ख़ास होते हैं और कुछ दिन...जैसे ८ फ़रवरी, अंदरूनी ख़ामोशी वाले ख़ास।

वैसे ही, आपका बिर्थडे मेरे लिए एक अलग और ख़ास मायना रखता आया है। न्यू इयर से ज़्यादा रेज़ोलुशन्स मैंने आज के दिन लिए और पूरे किये हैं। हफ़्तों या महीनों से पेंडिंग काम मैं कई दफ़े २० मई से ही शुरू कर पायी हूँ।

आज भी कुछ शुरू किया है पर ये तो बड़ा धुंधला सा टास्क है। इतना साफ़, इतना जल्दी नहीं दिख पायेगा। सच बताऊँ तो कुछ एक-आध हफ्ते से ही इसके लिए भिड़ गयी थी। सतह पे दिखने के लिए शायद कुछ और वक़्त लगे। पर हाँ, दिखेगा ज़रूर। और मुझे यकीन है की आपको अच्छा भी लगेगा।

क्या? किसकी बात कर रही हूँ मैं? टास्क, गिफ्ट या लफ़्ज़ों का गुच्छा। मुझे भी पता नहीं कि आपको आज मैं दे क्या रही हूँ। या सिर्फ इतना समझ लिया जाए कि मैं आज आपको एक चमकीला सा टुकड़ा दे रही हूँ। बीकानेर वाले मिल्ककेक की तरह चमकीला, मीठा और बिलकुल गरमागरम सा! व्वाह!

जैसे प्यार से चुराया हुआ मासूम मक्खन कान्हा के लिये सारे पकवनों से बढ़कर होता है। सोचती हूँ कि शायद उसी तरह से ये मेरा टुकड़ा भी आपको निश्छल लगे। क्योंकि चाहे मैं कितनी भी नज़रें चुरा लूँ या अपने मुठ्ठी-भर चावल की मैली पोटली छुपा लूँ...कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं।

चिड़िया कितनी दूर भी उड़ जाए पर घोंसला तो उसी पुराने बरगद पर ही बनाती है।~ पुतु

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